मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम

       मैं बंद है रात के अँधेरे कमरे में , बेचैन और डरा हुआ. अचानक पश्चिम के दरवाजे पर किसी की दस्तक होती है, मैंडरता हुआ किवाड़ खोलता है, लेकिन सामने कोई नहीं होता. डर और बेचैनी में वह गैलरी में जाकर देखता है, वहां से मैंको वाइट हाउस दिखता है, सबसे पुराने लोकतन्त्र में एक अलोकतांत्रिक व्यक्ति का शपथ ग्रहण हो रही है. मैं वापस अपने अँधेरे कमरे में चला आता है, वह नींद की गोलियां खोजता है, आज उसे इसके बिना नींद नहीं आएगी. लेकिन इस बार पूरब के दरवाजे पर किसी के संकाल पीटने की आवाज आती है. मैं द्वार खोलता है, लेकिन फिर सामने कोई नहीं होता, मैं फिर गैलरी में जाता है, देखता है की किसी प्राचीन से शहर में एक आदमी हजारों के हुजूम के साथ सड़कों पर चला जा रहा है. किनारों पर खड़े लोग उसका नाम पागलों की तरह चिल्ला रहे हैं. उस शोर की आवाज से मैंका कान फटा जा रहा  है, उसकी कानों से खून निकल आता है. मैंवापस अपने कमरें में आ किवाड़ बंद कर लेता है. अँधेरे में ही मैंअपने कान का खून साफ़ कर रहा होता है कि फिर उत्तर के दरवाजे के पीटने की आवाज आती है, इस बार चिढ़ में मैंदरवाजा नहीं खोलता. उत्तर के दरवाजे का शोर खत्म नही होता है कि दक्षिण का द्वार कोई पिटने लगता है. एकाएक उसके कमरें की दीवार गायब हो जाती है, दीवारों की जगह किवाड़ें आ जाती हैं, फ्रांस,सीरिया, तुर्की,कोरिया, रूस, तिब्बत, कश्मीर,चीन का किवाड़, और सारे दरवाजे एक साथ पीटे जाने लगते हैं.  ‘मैं’ को अब नींद की गोली खाने के बाद भी नींद नहीं आ रही है, मन बेचैन है, ऑंखें फड़क रही हैं, होठ बुदबुदाएं जा रहे हैं.

                        मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ और जॉर्ज ओरवेल की नॉवेल ‘नाइनटीन एट्टी-फोर’ फैंटसी में रची गयी कालजयी रचना है. दिलचस्प बात यह है कई दशक पहले लिखी गयी ये दोनों रचना वर्तमान में बहुत ज्यादा प्रासंगिक हैं. एशिया से खाड़ी देश तक और यूरोप से अमेरिका तक अधिनायकवादी सोच का फैलाव तेज़ी से हो रहा है. राष्ट्रवादी उन्माद, धार्मिक कट्टरता से सारे जरुरी मुद्दे गौण हो गये हैं. दम तोड़ रहे पूंजीवाद से त्रस्त जनता फासीवादियों के पीछे खड़ी होने लगी है. देश की नागरिकता से ज्यादा महत्वपूर्ण अब किसी पार्टी की सदस्यता हो गयी है और पार्टी का अंतिम और सबसे जरुरी आदेश है की अपने कान और आंख पर विश्वास करना छोड़ दो (जॉर्ज ओरवेल ,1984). अगर कोई पार्टी का आदेश नहीं मनाता है,अपने आँख,कान,दिमाग का इस्तेमाल करता है तो उसके लिए रूम नंबर 101 है,जहाँ पता किया जाता है मस्तक-यन्त्र में कौन विचारों की कौन-सी ऊर्जा, /कौन-सी शिरा में कौन-सी धक्-धक्/कौनसी रग में कौन-सी फुरफुरी/कहाँ है पश्यत् कैमरा जिसमें तथ्यों के जीवन-दृश्य उतरते. प्रतिरोध में बोलने वाले व्यक्ति की आत्मा तक को ढूंढा जाता है कहाँ है सरगना इस टुकड़ी का/ कहाँ है आत्मा? क्यों कि बिग ब्रदर का फरमान है स्क्रीनिंग करो मिस्टर गुप्ता/ क्रॉस एक्जामिन हिम थॉरोली (अँधेरे में ).

मुक्तिबोध के ‘अँधेरे में’ निकलने वाला फासीवादी दल अब उजाले में बेख़ौफ़ निकलता है. उसे अब बेनकाब होने का डर नहीं, अब वह नहीं कहता की आधीरात--अँधेरे में उसने/ देख लिया हमको / जान गया वह सब/ मार डालो, उसको खत्म करो एकदम. क्यों की देश के नागरिक फसिसिम को सेलिब्रेट करने लगे हैं. उन्हें बता दिया गया है की अल्टरनेटिव फैक्ट ही आज का सत्य है और सत्य एक कोरी बकवास.अधिनायकवाद ही लोकतंत्र का संरक्षक है और सेंसरशीप ईश्वरीय वरदान. उन्माद ऑक्सीजन है, धार्मिक कट्टरता राष्ट्रीय पहचान और जनता मान चुकी है युद्ध ही शांति है, पराधीनता ही स्वतंत्रता है, अज्ञानता ही बल है(जॉर्ज ओरवेल,1984). लेकिन फसिसिम को सेलिब्रेट करने के दौर में राष्ट्र की अवधारणा खंडित हो रही है, राष्ट्र ध्वज के कपडे चीथड़े होते जा रहे हैं, और राष्ट्र गान बेसुरा होता जा रहा है. अँधेरे कमरें का मैं इस राष्ट्रगान से दूर भाग कर, उस सर–फिरे जन का गीत सबको सुनाना चाहता है अब तक क्या किया / जीवन क्या जिया / ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम / मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम (अँधेरे में )

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अधिनायकवाद के खिलाफ लिखे गये नॉवेल 1984 की बिक्री ट्रम्प के शपथ ग्रहण के बाद से सिर्फ अमेरिका में 9500 प्रतिशत बढ़ गयी, ब्रिटेन में 20 प्रतिशत बढ़ गयी है और दुनिया भर में फिर से पढ़ा जाने लगा है. इस नॉवेल का अप्रत्याशित रूप से पढ़ा जाना कोई बड़ा बदलाव भले न लाए लेकिन नाउम्मीदी और बेतहाशा के समय में उम्मीद जगाता है कि हमारी प्रतिरोध की संस्कृति दरिद्र नहीं हुई है.अँधेरे कमरे में बंद ‘मैं’ का किवाड़ पिटा जा रहा है और उसे जगाया जा रहा है. इसी उम्मीद पर मुक्तिबोध कहते हैं  कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ / वर्तमान समाज चल नहीं सकता/ पूँजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता / स्वातन्त्र्य व्यक्ति वादी / छल नहीं सकता मुक्ति के मन को /जन को.


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