उसने आत्महत्या की और मैंने कविता लिखी

हाल में आपने कौन-सी हिंदी फिल्म देखी है जिसमे हीरो केले के बगान में इंट्री मारता हो ? जिसमे हीरो कुँए में नहाता हो ? जिसके गाने फूल के खेत में शूट हुए हो । जिसमे एक्टर हम आप जैसे खेतों में चना खाता नज़र आते हो ? जिसमे हमारे-आपके आस-पड़ोस जैसा ही वातावरण दिखाया गया हो। दिमाग पर बहुत ज्यादा जोर देने पर एक-याद ही फिल्म याद आती है। गैंग्स ऑफ़ वासेपुर , पान सिंह तोमर, ओमकारा , आँखों देखी , वेलकम टू सज्जनपुर , मसान जैसी कुछ फ़िल्में ही याद आती है। हिंदी की अधिकांश फिल्मों में हीरो की एंट्री डिस्को में होती है, प्लेन में होती है , एअरपोर्ट पे होती है या फिर लार्जर देन लाइफ तरीके से । हिंदी के डायरेक्टर ने एक अजीब तरह की धारणा बना ली है की जब तक विदेश में शूटिंग न हो , सिक्स पैक न हो , इंग्लिश-हिंदी रैप न हो तो फिल्म हिट नहीं हो सकती है । ये डायरेक्टर अपनी फिल्मों में वह माहौल नहीं दिखाते जहाँ देश की अधिकांश आबादी रहती है , बल्कि वह माहौल दिखाते हैं जहाँ ये खुद रहते हैं । हालिया रिलीज ऐ दिल है मुश्किल इन बातों का बढ़िया उदाहरण है। फिल्म का हीरो प्राइवेट प्लेन से घूमता है , लन्दन, पेरिस की शूटिंग,महंगे पोशाक,और चार लच्छेदार गाने। बावजूद इसके ऐ दिल है मुश्किल एक घटिया फिल्म है। जो मुश्किल से सौ करोड़ कमा पाती है । अगर इस तरह की फ़िल्में सौ करोड़ या उससे ज्यादा कमा भी लेती हैं इस कारण नहीं की वह फिल्म अच्छी थी , या डायरेक्टर ने एक मास्टरपीस बनाया है । बल्कि इस कारण कमा लेती है की डायरेक्टर ने दर्शकों के आँखों में धूल झोक कर वह फिल्म दिखा दी जो उनसे सरोकार नहीं रखती है। 
                                                                  हाउसफुल 3 जैसी फिल्म सौ करोड़ कमा लेती है और अलीगढ़ , मसान टाइप फिल्मों को सिनेमा हाल भी नसीब नहीं होता । यह दुर्भाग्य है हिंदी के दर्शकों के लिए । मसान जो इतनी बेहतरीन फिल्म होने के बावजूद महज 200 सिनेमा हॉल में दिखाई जाती है । और शिवाय या ऐ दिल है मुश्किल जैसी घटिया फिल्म 2000 से अधिक सिनेमा हॉल में दिखाई जाती है । महत्त्व की बात यह नहीं है की आप कितनी शानदार फिल्म बना रहे , महत्त्व की बात यह है की आपकी शानदार फिल्म को सिनेमा हॉल मिल पा रहा है या नहीं । पिछले साल जब मसान रिलीज हुई तो मन फिल्म देखने के बावजूद छटपटा के रह गया । कारण की फिल्म बिहार में सिर्फ मोना में ही लगी । बस एक सिनेमा हॉल । हमारे शहर के हाल में नहीं । इस साल भी जब अलीगढ़ रिलीज हुई तो नहीं देख पाया । फिल्म दो महीने बाद टोरेंट से डाउनलोड किया ।
                             ये सारी भूमिका मैंने इस लिए बांधी ताकि आप इस साल की मराठी फिल्म सैराट की बातों को बेहतर ढंग से समझ पाए । साल के अप्रैल महीने में एक मराठी फिल्म ख़ामोशी से सिनेमा हाल आती है लेकिन फिल्म दुसरे हफ्ते से ही तांडव मचाना शुरू कर देती है । सैराट देख के हिंदी फिल्म वालों की रातों की नींद गायब हो जाती है । आमिर खान , सलमान खान करण जौहर तारीफ करते नहीं थकते । देखते ही देखते फिल्म शाहरुख़ खान के फैन से ज्यादा कमाई कर लेती है। महाराष्ट्र में फिल्म को रात के 3 बजे भी दिखाने जाने लगता है । दिल्ली , नॉएडा में भी लोग मराठी फिल्म देखने वालों की लंभी कतार लग जाती है । इरफ़ान खान फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग रखते हैं । सैराट की इतनी बड़ी हिट होनी की क्या वजह रही ? मेरे ख्याल से पब्लिक को जब उनकी कहानी उनकी ही भाषा में जब कही जाती है वो फिल्म को सर आँखों पे बिठा लेते हैं। आम आबादी ने जो जिंदगी जिया है , जिस तरह से प्यार किया है,  वही परदे पे आ जाये तो उसकी आँखें चमक उठती है , मन खुश हो जाता है । फिल्म का हीरो केले के बगान में एंट्री मारता है। कपडे एकदम साधारण पहनता है। उसका कॉलेज कोई स्टूडेंट ऑफ़ द इयर टाइप नहीं होता, वैसा ही रहता है जहाँ आम आबादी पढ़ती है।
                                                       खास बात है फिल्म का अंत , जो एक फिल्म का पार्ट हो के भी बिलकुल भी फ़िल्मी नहीं है । यही वो जगह है जहाँ दर्शक सबसे ज्यादा फिल्म से जुड़ जाता है । बिलकुल उसके आस-पास ही घटनाएँ उसे याद आने लगते हैं । इस पॉइंट तक दर्शक खुद को परदे पर नायक के रूप में देखना शुरू कर देता है लेकिन फिल्म के अंत में दर्शक जब खुद का अंत नायक के रूप में देखता है तो यह सिन उसे विचलित कर देता है । और यही पॉइंट फिल्म कोई कालजयी बनाती है ।



नागराज मंजुले

                           भारतीय सिनेमा में तूफ़ान लाने वाले और इस कालजयी फिल्म के सृजनकर्ता हैं नागराज पोपटराव मंजुले । फिल्म के डायरेक्टर । नागराज मंजुले कभी कॉलेज के प्रोफेसर बनना चाहते थे । NET का एग्जाम पुरे नौ बार दिया लेकिन हर बार फेल । दोस्त ने कहा की तुम फिल्म अच्छी बना सकते हो , तो फिल्म बनाने लगे । पहली फिल्म एक शॉर्ट  फिल्म बनायीं पिस्तुल्या  इस फिल्म के लिए नागराज मंजुले को राष्ट्रपति पुरस्कार मिला । मंजुले सर की गाड़ी चल पड़ी । उनकी दूसरी फिल्म आई फैन्ड्री । फिर से राष्ट्रपति पुरस्कार । सिर्फ पुरस्कार पा के मंजुले खुश होने वालों में से नहीं थे । दलित प्रेम कहानी पर बनी फैन्ड्री को क्रिटिक्स ने जरुर सराहा पर ज्यादा लोगों ने फिल्म देखी नही । मंजुले ने अपनी भूख को मिटाने के लिए फिर बनायीं सैराट ।  

राष्ट्रपति से सम्मान प्राप्त करते नागराज मंजुले

 मजुले खुद समाज के पिछड़े पायदान से आने वाले हैं । तभी उनकी कहानी इतने विस्तृत तरीके से कह पाते हैं । उनकी आकांक्षा, उनके अंतर्द्वंद, उनका डर सभी कुछ। मंजुले सर धर्म पर भी अपनी बात खुल के कहते हैं । Indian express  को दिए गये इंटरव्यू में वह कहते हैं की आज धर्म के खिलाफ बोलने वालों को भगवान से ज्यादा भगवान के स्व-घोषित दूत से डर लगता है ।
इंडियन एक्सप्रेस में उनका इंटरव्यू

नागराज मंजुले खुद को बस फिल्मों तक ही नहीं सीमित करते हैं । वो समाज से जुडी बातों उनके समारोह में भी खुल के भाग लेते हैं । महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष नरेन्द दाभोलकर की हत्या जब हिंदूवादी संगठन के लोग करते हैं तो विरोध में बुद्धिजीवियों के साथ मंजुले भी सड़क पर उतरते हैं ।


नरेन्द्र दाभोलकर के हत्या के विरुद्ध सड़क पे विरोध जताते नागराज

मंजुले सर अम्बेडकर के विचारों को मनाते हैं , फिल्म बनाने में मंजुले सर को अम्बेडकर के विचार से प्रेरणा मिलती होगी ।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी के लाइब्रेरी में लगे अम्बेडकर के प्रतिमा के साथ नागराज

कोलंबिया यूनिवर्सिटी लाइब्रेरी

नागराज मंजुले फिल्म मेकर के साथ साथ कवि भी है उनकी किताब है Unhachya Katavirudhha (उन्हाच्या कटाविरुध्) । उनकी इस किताब के लिए भैरुरतन दमानी साहित्य पुरस्कार Bhairuratan Damani Sahitya Puraskar मिला है ।

नागराज की कविताएँ –
1.
इस सनातन बेवफा धूप से डर कर
तुम क्यों हो रही हो सुरक्षित
खिड़की में सजी बोनसाई
और लाचार बन के मांग रही हो छांव
इस अनैतिक संस्कृति में नैतिक होने के हठ से
क्यों कर रही हो
आकाश जैसे फैले मन के विस्तार को दफ़न
क्यों तुम इस धूप की  साजिश के  खिलाफ
गुलमोहर की तरह आग सी नहीं खिल रही ?

 2.
एक जैसे मिज़ाज वाले हम दो दोस्त
एक दुसरे के चहेते
एक ही ध्येय
एक ही सपना देखकर जीनेवाले
बाद में उसने आत्महत्या की और मैंने कविता लिखी


अंत में बस इतना की हिंदी के तथाकथित टॉप डायरेक्टर को नागराज मंजुले आइना जरुर दिखाते हैं और हम दर्शकों को एक और बेहतरीन फिल्म की उम्मीद । 

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