प्रेम करना ही सबसे बड़ा गुनाह है


सैराट देखे आज चौथा दिन है । मन अब भी बेचैन है । डर अभी तक शेष बचा है । कल तक मैं  जो कहता फिरता था कि मुझे किसी से डर नहीं लगता अब हर एक चीज़ से डर लग रहा है जो प्रेम से जुड़ा हो । फेसबुक चला रहा हूँ , किसी दोस्त की तस्वीर आती है। मुझे उसके और उसके गर्लफ्रेंड को लेकर डर लगाने लग जाता है। किसी के प्रोफाइल पर in relationship का स्टेटस लिखा देख डर लगने लग जाता है। कही भी सैराट के गाने सुनता हूँ डर लगता है । मैं हर दिन कोई न कोई फिल्म देख ही लेता था लेकिन अब कोई फिल्म देखने का उमंग नहीं बचा है । फिल्म देखने के बाद मैं रोना चाहता था लेकिन अब डरना चाहता हूँ । खूब डरना चाहता हूँ । इसलिए डरना चाहता हूँ ताकि प्रेम न कर सकूं। मुझे प्रेम के अंजाम से डर लगने लगा है। इसलिए कहता हूँ की अगर आप प्रेम में हैं तो मत देखिए सैराट । आप डर जाईयेगा . सड़क पर जो हाथ पकड़ कर बेख़ौफ़ घूम रहे हैं कल से नहीं घूम पाईएगा । हर घूरती नज़र से आपको डर लगने लग जायेगा । 
                                           
                                                                   माना जाता है की कोई भी कहानीकार अपने अंदर की भावना को मात्र बीस प्रतिशत ही कहानी में कह पाता है । अगर यह फिल्म कहानीकार सह डायरेक्टर नागराज मंजुले की भावना का मात्र बीस प्रतिशत ही उपज है तो सोचिये की जिस सैराट की कहानी से हम कई दिन तक डरे हुए हैं नागराज मंजुले की क्या मनोदशा रही होगी । उनका तो पूरा माथा डर से फटा जा रहा होगा।

पिछले बार हड़बड़ाहट में मन में जो भी आया लिख दिया । सोचा डर कम हो जायेगा । कल भी दिन भर नेट पे सैराट के बारे में पढ़ता रहा है । कई आर्टिकल में सैराट को लोग दलित और सवर्ण की प्रेम कहानी और फिर उसके परिणाम की फिल्म बता रहे हैं। सही है इस फिल्म का प्रेमी दलित है । लेकिन उसकी हत्या मात्र इस लिए कर दी गयी की वह दलित हो कर सवर्ण की लड़की से प्रेम किया । ये कारण पर्याप्त नहीं है । प्रेमी की कोई जाति नहीं होता । उसका कोई पंथ नहीं होता । उसकी हत्या तो इसलिए कर दी गयी की उसने प्रेम किया । प्रेम करना ही सबसे बड़ा गुनाह है । इस देश में हजारों समजातीय प्रेम करने वालें प्रेमी जोड़ों को भी मार दिया जाता है । इसमें तो जाति का बंधन नहीं टूट रहा था । फिर क्यों ? वास्तव में प्रेम करना ही गुनाह है । लोग डरते हैं की हमारे बनाये नियम टूट जायेंगे। उनका डर तब और भी बढ़ जाता है जब कोई जाति के बंधन को तोड़ कर प्रेम करते हैं। अपना अनुभव बता रहा हूँ । मैं जब स्कूल में था तो एक अजीब तरह का दकियानुस माहौल बन रहता था स्कूल में । लड़का और लड़की को बात करने की इजाजत नहीं। दोनों के क्लास अलग अलग। जब लड़के वाईवा दे रहे हो तो लड़की बहार और जब लड़की वाईवा दे रही हो तो लड़के बहार।। यहाँ तक के दोनों के लिए पानी पीने के लिए चापाकल भी अलग-अलग । अजीब लगता है अब , सोच कर की एक साथ पानी पीने में कौन सा बवाल मच पड़ेगा। कौन सा मॉडर्न इंडिया ये बनाना चाह रहे थे ।

                                                   इस साल के शुरुआत में एक कविता लिखी थी । फिल्म देख कर मुझे मेरी ही कविता और बेहतर समझ में आने लगी है ।  

चांद को फतवा

प्रेम में
तड़पता प्रेमी
अपने हृदय की 
व्याकुलता शांत 
करने के लिए 
घंटों देखता है चाँद को 
शायद चाँद में उसे
अपनी महबूबा
नजर आती होगी

कवि ने भी चाँद को
कभी प्रेमिका बताया
कभी प्रेमिका को 
चाँद से भी सुन्दर

यह चाँद ही गुनहगार है
किसी के प्यार करने के जुर्म में
यह चाँद ही है जो 
भड़कता है प्यार करने को

और यह प्यार
तोड़ रहा है 
उनके बनाये नियम को 
यह प्यार ही है जो 
ख़राब कर रहा है
उनकी संस्कृति को
सदियों के संस्कार को

उन्होंने सुना दिया
चाँद को फ़तवा
मत निकलना कल से 
आकाश में 
मत बिखेरना प्यार के बीज
धरती पर 
नहीं तो दर्जनों 
प्रेमी युगल की तरह 
तुम्हें भी चढ़ा दिया जायेगा 
शूली पर ।

                               फिल्म की प्रेमिका आर्ची एकदम बिंदास, बेख़ौफ़, आजाद है । लड़कों से तनिक भी कम नहीं । घोड़े की सवारी करना । टैक्टर चलाना । बुलेट चलाना । खुल के प्रेम करना । बाप से भीड़ जाना । प्रेमी को बचाने के लिए रिवोल्वर चला देना । ऐसी आर्ची बनने का ख्याब हर लड़की को देखना चाहिए। अपने अंदर के छिपे उमंग को खुल के जीने का मौका देना चाहिए । देश के हरेक आर्ची या आर्ची बनने की ख्याब रखने वाली लड़कियों के नाम 

इश्क़ में पाग़ल लड़कियां

इश्क़ में पाग़ल लड़कियां
पृथ्वी की तरह
नहीं करती परिक्रमा
सूर्य की ।
ये लड़कियां तो माप आती हैं
ब्रह्मांण्ड की अनंत सीमा को
एक ही छलांग में ।

ये नदियों की तरह,
चट्टानों से टकराती
बहती हैं पुरे वेग से धरती पे
यहाँ से वहाँ ।

नही डरती किसी झूठी बदनामी से
नही सोचती कि
पड़ोस के लोग क्या सोचते हैं ?
ये तो इश्क करती हैं
किसी शास्वत क्रिया की तरह
जैसे सूर्य उगता है , हवा चलती है
बारिश होती है , पत्ते झड़ते हैं 
इश्क़ में पागल लड़कियां
बने बनाये ढांचे को तोड़
खुद अपनी साँचे तैयार करती हैं 
 
क्योंकि इश्क़ में पागल लड़कियां ही
ज़्यादा स्वतंत्र होती हैं ।


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