इस मशान पर मुर्दे जलाए जाते नही बल्कि यहां इसांन जीवित होते हैं

इस मशान पर मुर्दे जलाए जाते नही बल्कि यहां इसांन जीवित होते हैं 
भी अभी फ़िल्म 'मसानदेखा। अनुराग कश्यप की टीम से निकली एक और बेहतरीन फ़िल्म। फ़िल्म इस साल 24 जुलाई को रिलीज हुई थी पर दुर्भाग्यवश अब देख पाया हूँ। एक तो ऐसी फ़िल्म छोटे शहरों में रिलीज नहीं होती दूसरी इन फ़िल्मों को इंटरनेट पे आने में टाइम लग जाता है । 

हिंदी सिनेमा ख़ास कर के कमर्शियल सिनेमा (वही फिल्म में जो घटिया होने के बावजूद 100 करोड़ से ज्यादा काम लेती हैं और जिनका मूल मकसद पैसा कमाना होता है ) में प्यार को पैसा कमाने का जरिया माना जाता है । प्यारइमोशनल लाइम-लाइट चकाचौंध,बिना सरपर के गाने का कॉकटेल बना परोस देता है हम दर्शकों के सामने और हम भी बिना कुछ ज़्यादा सोचे समझे दौड़ पड़ते हैं फ़िल्म देखने। बड़े प्रोडक्शन हाऊस और बड़े स्टार के नाम पर कमजोर फिल्में भी हिट हो जाती हैं और अच्छे कहानी वाली शानदार फिल्मों को सिनेमाघर नही मिल पाता है और असफल हो जाती हैं । यह हिंदी सिनेमा या किसी भी सिनेमा के लिए अच्छी बात नही है । पर पिछले कुछ वर्षों में यह परिपाटी टूटती नज़र आ रही है और इसका श्रेय जाता है अनुराग कश्यप को । कभी राम गोपाल वर्मा के सहायक निर्देशक का काम करने वाले अनुराग आज भारत से सबसे बड़े निर्देशकों के ग्रुप के सृजनकर्ता और इस ग्रुप के लीडर हैं । इस ग्रुप के फिल्में PHANTOM फैंटम नाम के प्रोडक्शन हाउस से रिलीज होती हैं । देव डी गैंग्स ऑफ़ वासेपुर उड़ान क्वीन हंटर लूटेरा,द लंचबॉक्सइन.एच 10 । और इस कड़ी की नयी फ़िल्म है 'मसान। फ़िल्म के निर्देशक नीरज घेवन हैं नीरज इससे पहले गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के सहायक निर्देशक रह चुके हैं ।

फ़िल्म के बारे में पहले बता दूं की फ़िल्म को विश्व सिनेमा जगत की प्रतिष्ठित अवार्ड कांस से un certain regard श्रेणी से सम्मानित किया जा चुका है । यह हिंदी सिनेमा के लिए गौरव की बात है। फ़िल्म के लेखक और गीतकार वरुण ग्रोवर हैं । फ़िल्म का निर्माण चार प्रोडक्शन कम्पनियों ने किया है - Drishyam Films ,Phantom Films, Macassar Productions, Sikhya Entertainment । फ़िल्म में अभिनय किया है जाने माने एक्टर और अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने वाले संजय मिश्रा ने और फ़िल्म में उनकी बेटी का किरदार निभाया है रिचा चड्डा ने जो हमेशा ही अलग और अनोखे किरदार में शानदार तरीके से अभिनय कर सबको चौकाती रहती हैं कभी गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में नग़मा के किरदार में कभी तो कभी फुकरे में भोली पंजाबन के किरदार में । फ़िल्म में दो नए चेहरे हैं स्वेता त्रिपाठी और विक्की कौशल जो फ़िल्म में एक प्रेमी जोड़े के किरदार में हैं । फिल्म में छोटे से रोल में जान फूंकने वाले पंकज त्रिपाठी भी हैं ।

फ़िल्म में बनारस की दो कहानियों को दिखाया गया है । पहली कहानी है देवी की (रिचा चड्डा ) जो एक ट्यूशन इंस्टिट्यूट में टाइपिस्ट का काम करती हैं और उसका दोस्त बनता है पीयूष जो की वही पढता है । दोनों ही अपनी सेक्स की जिज्ञासा मिटाने के लिए होटल में एक रूम बुक करते हैं पर दुर्भाग्यवस वहां पुलिस पहुँच जाती है । प्रेमी पीयूष बदनामी के डर के कारण होटल के बाथरूम में आत्महत्या कर लेता है और देवी को पुलिस थाने ले जाती है और वहां  देवी के पिता विद्याधर पाठक(संजय मिश्राको बुलाती है पाठक बनारस के घाट पे पूजा की सामान बेचते हैं इससे पहले ये यूनिवर्सिटी में काम करते थे । थाने में पुलिस इंस्पेक्टर विद्याधर पाठक को इन सब बात को दबाने और बदनामी से बचने के लिए लाख रूपए घुस मांगता है । विद्याधर की इतनी रूपए की हैसियत नहीं है फिर भी बदनामी के डर से और इंस्पेक्टर के ज़ोर से मान जाते हैं और शुरू हो जाता है पैसा जुटाने की कहानी ।
दूसरी कहानी है दीपक(विक्की कौशल) की जो पॉलटेक्निक में सिविल ब्रांच में थर्ड इअर का स्टूडेंट है । दीपक को बनारस की ही लड़की शालू(स्वेता त्रिपाठी) से प्यार हो जाता है । फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने से सिलसिला शुरू होता है और दशहरा के मेले में पीछा करना और फेसबुक पर बात करते हुए प्यार एक हो जाता है । दीपक जाति का डोम है इसके पिता बनारस के घाट पे मुर्दा जलाने का काम करते हैं। शालू उच्च जाती की लड़की है और यह बात दीपक को पता है फिर भी प्यार में आगे बढ़ता है  पर जब उसके दोस्त कहते हैं की ज़्यादा दूर मत जाना लड़की उच्च जाति की है तो माने दीपक के दिल की दर्द उसके चेहरे पे आ जाता है ।पर प्यार को जारी रहता है। शालू को शायरी बहुत पसंद है गालिब, बशीर बद्र, दुष्यत कुमार के गजलों की दिवानी है और गजल दीपक को भी सुनाती रहती है । दीपक को शायरी की कहां समझ रहती है कभी समझ आती कभी नही भी । इसी तरह आगे बढ़ती जाती है दोनों का प्रेम । दीपक के जाति से अनजान शालू एक दिन पूछती है की दीपक तुम्हारा घर कहाँ है पहली दफा तो दीपक अनमने भाव से अधुरा बात बताकर टाल देता है पर कुछ समय बाद शालू फिर पूछती है की तुम कहाँ रहते हो तो इस बार दीपक इनकार नही कर पता और गुस्से में सब सच बता देता है।कई दिनों तक दोनों नही मिलते हैं । दीपक को अपने गुस्से पे अफ़सोस भी आता है। शालू को कॉल करता है पर उधर से कॉल रिसीव नहीं होता । दीपक को लगता है कि वह मेरा जाति जान गई । अब सब खत्म हो गया । अब शालू कभी बात नही करेगी। दीपक निराश मन से गंगा में नाव पर घुम रहा होता है कि अचानक फ़ोन आता है । देखता है फ़ोन शालू का है पहले तो वह अचम्भा में पड़ जाता है फिर फोन उठाता है । शालू बताती है की परिवार के साथ बस से तीर्थ को जा रही है । और कहती है

"अच्छा सुनों ना
हमारे मम्मी पापा है न ..वो.. कभी तुम्हें एक्सेप्ट नहीं करेंगें
उनकी न वो बहुत ही घिसी-पिटी पुरानी सोच है
लेकिन हम तुम्हारे साथ हैं
और हमने सुना है की बाद में सब ठीक हो जाता है तुम बस अच्छी सी नौकरी ढूंढ लो । "

यह सुन दीपक के ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता वह लग जाता है अपने कैंपस प्लेसमेंट के इंटरव्यू के तैयारी में । अगले ही दिन जब अपने पिता और भाई के साथ बनारस के घाट पे मुर्दे जला रहा था । तो एक लाश आती है घाट पे । दीपक ने उस लाश की चिता सजाई । लाश को जब चिता पे रखा जा रहा होता है तब दीपक को ढके हुए लाश के हाथों की अंगूठी जानी  पहचानी लगी जब कफ़न हटा कर देखता है तो वो शालू रहती है । लोगों से पता चलता है की कुछ लोग तीर्थ पे गए थे बस का रास्ते में दुर्घटना हो गया बस का कोई नहीं बचा । लाशों को संस्था वाले यहाँ छोड़ गए । दीपक की सारी दुनिया एक पल में ही उजड़ हो जाती है । अपनी प्रेमिका के लाश को खुद आग देता है उसके शरीर को अग्नि में समाते देखता है । अपनी प्रेम को खुद भस्म करता उस भोले से मासूम प्रेम को । जाति के बंधनों को तोड़ दोनो एक होने जा रहे होते हैं पर जीवन-मौत के बंधन को कौन लाँघ पाया है। शालू की याद में तड़पता दीपक खोया रहता है इस दुनिया से ।वह रहता है और नही भी । आंसू भी सुख गए हैं। पर धीरे धीरे दीपक शालू की याद को भूला कर रेलवे में नौकरी करने इलाहाबाद चला जाता है । 
           उधर देवी और उसके पिता विद्याधर पाठक किसी तरह जुगाड़ कर इंस्पेक्टर को 3 लाख रूपए दे देते है । पर देवी अभी भी अपने प्रेमी पीयूष को भूल नही पाती और इलाहबाद यूनिवर्सिटी में पढने के मकसद से पीयूष के शहर इलाहाबाद जाती है और इलाहाबाद के गंगा घाट पर पीयूष का दिया गिफ्ट रोती हुई गंगा में बहा देती है ... उसी घाट पर दीपक भी बैठा रहता है शालू को याद करते हुए। इसी घाट से एक बार दीपक और शालू नाव से संगम गए थे । देवी को रोता देख दीपक जा अपने बोतल का पानी देता है । तभी उधर से नाव वाला दोनों को देख पूछता है संगम जाना है ? चलिए घुमा कर ले आते है। दोनों बैठ जाते है संगम की नाव पर।

दीपक पूछता है देवी से -  कभी संगम आईँ हैं ?
देवी नही और आप ?
दीपक दूसरा बार है .. ऐसे किसी ने कहा है कि संगन दो बार आना चाहिए एक बार अकेले और एक बार किसी के साथ ।

और नाव निकल पड़ती है नदियों के संगम की ओर और आत्मायों के संगम की ओर ।

कहानी से इतर 

मसान का अर्थ होता है वह जगह जहां मुर्दे जलाए जाते हैं पर यह मसान ऐसा है जहां से इंसान जीवित होता है । ऐसी साधारण कहानी जहां कुछ भी अजूबा या अलग नही है । ऐसे किरदार हमारे आस-पास ही रहते है । हमारे आस-पास जाति के बंधन को तोड़ प्यार करने वाले लोगों की अथाह संख्या है जो कि धीरे धीरे बढ़ती ही जा रही है जो जरूरी भी है सदियों से स्थिर स्थूल पड़े समाज को गति देने के लिए । छोटे शहरों का प्यार बड़े शहरों के प्यार एक जैसा नही होता है । बड़े शहरों में जब लड़का और लड़की बात कर रहे होते हैं तो यह दोस्ती भी हो सकती है और प्यार भी । पर प्यार छोटे शहरों में जब लड़का लड़की बात कर रहे होते हैं तो यह सिर्फ दोस्ती नही होती उससे आगे की भावना होती है । फेसबुक बड़े शहरों में रोजाना के रुटीन में परिवर्तन लाता है या दोस्तों से जोड़ पाता है या काम आसान कर पाता है । पर छोटे शहरों या कस्बों में यह मात्र दोस्तों,चाहने वालों से ही नही जोड़ता अपितु मौन रूप से सामाजिक बदलाव लाता है । जाति बंधन से जकड़े समाज में जहां तय होते हैं किससे बोलना है और किससे नही , जहां समाज की नजरें लड़कियों पर होती है कि वे क्या कर रही है, किससे बोल रही है , कैसे बात कर रही है । उन समाजों में फेसबुक सामाजिक बंधन को काट कर बात करने का जरिया बन रही है । कोई मोची का लड़का किसी ब्रहाम्ण की लड़की को फ्रेंड रिक्वेट भेजता है और शुरु होता है सदियों से दबी शब्दों का आदान-प्रदान । कोई पठान की लड़की से कोई हिंदु लड़का बात कर पाती है । यह शुरू होता है फेसबुक से । ऐसा नही है कि ऐसा पहले नही होता था । दर्जनों कहानियां है हमारे बीच । पर फेसबुक ने संवाद की इस प्रकिया थी उसे गति प्रदान की है । जिसे फिल्म में बखूबी दिखाया गया है । यह गति बरकरार भी रहनी चाहिए ।  फिल्म की एक और खासियत सह है कि फिल्म को बड़े ही सादगी से बनाया गया है इसमें कृत्रिमता जैसा कुछ नही है तभी तो यह फिल्म दर्शकों के इतना करीब आ पाता है। आजतक जितनी भी फिल्मों में बनारस को दिखाया गया है उसमें से सबसे अलग है यह फिल्म । उन फिल्मों में काशी विश्वनाथ मंदिर को दिखाया गया है । गंगा के घाटों दिखाया गया है । पर इसमें बनारस में जलते लाशों को दिखाया गया है इसके लिए भी तो मशहूर है बनारस । फिल्म में बनारस के घाट पर मुर्दे को जलाते हुए और जलाने वाले के जिंदगी को जितनी विस्तार से दिखाया गया है मेरे लिए एकदम नया है बहुतों के लिए भी नया ही होगा । फिल्म की कहानी आसान सी है पर पूरे फिल्म को अपने अंदर समाहित करने के लिए इसके एक एक दृश्य को देखना जरूरी हो जाता है ।जब दीपक शालू के लाश को आग दे रहा होता है और बैठ कर लाश जलते देख रहा होता है । यह दृश्य बहुत ही प्रभावकारी है आंख से आंसू आ जाते हैं । और भी बहुत ऐसे दृश्य जिन्हें मैं उपर कहानी में नही लिख पाया ।  


काश ऐसी फिल्में लगातार बनती रहें .... हमारा भी फर्ज बनता है इन फिल्मों को देखे । कह दे अब उन घटिया फिल्मों के निर्माणकर्ता से बंद कर दो अब बकवास बनाना । 


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