शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है... जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है

"शोहरत की बुलंदी भी पल भर का तमाशा है
जिस डाल पे बैठे हो वो टूट भी सकती है ।"
शीर बद्र का यह शे'र हमेशा से चरितार्थ होते आया है । कभी हमारे जीवन में तो कभी आपके जीवन में । यह  शे'र किसी सार्वभौमिक कथन की तरह सत्य है ,जिसे काटा नही जा सकता है । शोहरत और सफलता किसी की ग़ुलाम नही होती , यह अपना मालिक ख़ुद चुनती है । शोहरत कभी स्थिर नही रहती , यह कभी किसी के पास कम समय तक रहती है तो कभी अधिक समय तक , पर बदलती जरूर है । क्योंकि बदलते रहने से ही इसती महत्ता बरकरार रहती है । अगर यह किसी व्यक्ति की गुलाम हो जाए तो इसे पाने की चाह दूसरों में समाप्त हो जाएगी, और जब चाह समाप्त हो जाएगी तो महत्ता भी समाप्त हो जाएगी । इसलिए बदलते रहना इसकी फितरत है और जरूरत भी ।

मैं यह बात इसलिए कह रहा हूँ क्यों की वर्तमान भारतीय राजनीति में भारतीय जनता पार्टी को हराना लगभग ना मुमकिन हो गया था । 2014 में पार्टी को लोकसभा में 283 सीट आई थी और कांग्रेस महज 44 पर सिमट गयी थी। और इस जीत के हीरो रहे थे तब के पार्टी के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार अब के प्रधानमंत्रीनरेंद्र मोदी । पार्टी मोदी के नेतृत्व में एक के बाद एक राज्यों के विधानसभा चुनाव जीतते चले गए । जम्मू कश्मीर , महाराष्ट्र , हरियाणा , झारखन्ड । लगतार इन जीत से  बीजेपी के सभी नेता , कार्यकर्ता , समर्थक का  जोश उत्साह उमंग उल्लास(और हाँ दम्भ और घमण्ड भी )अब तक के सबसे ऊँचे स्तर पर था ।

फिर इस साल जनवरी में जब दिल्ली विधानसभा का जब चुनाव हुआ तो बीजेपी को महज 3 सीट ही हासिल हुई और आम आदमी पार्टी को 67 सीटें हासिल हुई । बीजेपी के लिए यह हार एक राज्य और सीट के नजरियें से देखें तो बड़ी हार थी पर दिल्ली की जनंसख्या और क्षेत्रफल के हिसाब से देखे तो यह बड़ी हार नही थी क्यों की पार्टी लोकसभा में और महाराष्ट्र राजस्थान जैसे बड़े राज्यों के विधानसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल की थी ।


पर हाल में जब 8 नवंम्बर को बिहार विधानसभा का परिणाम आया तो बीजेपी को करारी हार का सामना करना पड़ा । 243 सीट वाली विधानसभा में बीजेपी को 51 सीट हासिल हुई और प्रतिद्वंदी महागठबंधन(राष्ट्रीय जनता दल + जनता दल यूनाइटेड + कांग्रेस ) को 178 सीट हासिल हुई । बीजेपी के लिए यह चुनाव नाक का सवाल बन गया था । जिस तरह से प्रधानमंत्री की 30 से अधिक रैलियाँ की गयी (जो की चौकाने वाला था) । पार्टी अध्यक्ष अमित शाह 6 महीने तक बिहार में जीत हासिल करने पर ही रणनीति बनाते रहे । लगभग सभी केंद्रीय मंत्री , सांसदों का ताबड़तोड़ चुनाव प्रचार करना यह बताता है की यह कोई साधारण चुनाव जैसा नही था ।


इस चुनाव में दो ही चीज़ हो पाता पहला यह की  बीजेपी के लगतार जीतने के क्रम को रुकता और दूसरा की लालू और नीतीश के राजनीति समाप्त हो जाता। 5 चरण में हुए इस चुनाव में जनता ने परिणाम के रूप में पहला विकल्प चुना यानि की बीजेपी की हार और इसके अपराजेय होने पर विराम लगा देना ।  बिहार में हुए इस चुनाव का पुरे देश में असर पड़ा । नीतीश कुमार और लालू प्रसाद दो नए नायक के रूप में उभरे । नीतीश किंग के रूप में तो लालू किंगमेकर के रूप में । मोदी का विकल्प लोग नीतीश को मानने लगे । इस चुनाव में बीजेपी के हार से मोदी के पार्टी के अंदर ही आलोचना की शुरुआत भी हुई । अब पार्टी में कई नेता खुलकर सामने आये।


बिहार चुनाव में बीजेपी की हार और महागठबंधन की जीत से जुड़ी कुछ पहलु पर एक नज़र -

जाति बनाम विकास
पिछड़े हुए राज्यों में और जाति प्रधान राज्यों में चुनाव में इन दो विकल्पों - जाति और विकास - को जनता के सामने रख दिया जाता है जिसे एक दूसरे के विपरीत बताया जाता है । यानि की जाति चुनने पर विकास संभव नही होता है । बिहार चुनाव में भी ऐसा ही विकल्प प्रस्तुत किया गया । बीजेपी ने पिछड़ा बाहुल्य बिहार में मतदाता से जाति को वोट देना और विकास को वोट देना जैसे दो विकल्प प्रस्तुत किया । यानि की विकास मतलब बीजेपी नरेंद्र मोदी और जाति मतलब लालू यादव । बीजेपी को उम्मीद थी की बिहार के लोग पिछली लोक सभा की तरह विकास के दूत बनकर आये नरेंद्र मोदी को चुनेंगे । चुनाव प्रचार में भी इसी संजीवनी को बीजेपी के लोग अपनाती रही । पर परिणाम जब आया तो बीजेपी करारी हार मिली । पर ऐसा क्यू हुआ ?


बीजेपी के नेता चुनाव प्रचार में मतदाता को जो बताते फिर रहे थे की जाति और विकास एक दूसरे के विपरीत है । लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं होता ख़ास कर के बिहार जैसे राज्यों में । हर पार्टी किसी न किसी ख़ास जाति की पार्टी होती है और उस जाति के लोग का परंपरागत वोट उन्हें ही जाता है । ऐसा इसलिए होता है की एक ख़ास पार्टी अपने चुनावी एजेंडे में ख़ास जाति के विकास से जुड़ी बाते रखते है जबकि दूसरी पार्टी दूसरे जाति से जुड़ी बाते रखते हैं । लोगों के बीच ऐसी धारणा बन जाती है की उस पार्टी के आलावा हमारे जाति का विकास कोई और नही कर सकता । जो की बहुत हद तक सही भी है । यानि की विकास भी जाति के अनुसार । ऐसी धारणा में जाति और विकास एक दूसरे के विपरीत होने के बजाये एक दूसरे से जुड़ जाते हैं । बिहार में पिछड़ी जातियाँ बहुत अधिक हैं और उन्हें लगा या उनमें ऐसी धारणा पहले से है की बीजेपी सवर्णों की पार्टी है यह विकास तो कर सकती है पर अगड़ो की , पिछड़ों का विकास नही कर सकती । इसलिए उन्होंने लालू-नीतीश को चुना और इतना व्यापक जीत दिलाई ।


बिहार के इस चुनाव या कोई भी चुनाव में एक आरोप नेताओं पर लगता है जातिवादि होने का । बिहार में ये कहा गया की लालू जातिवादी है । पिछड़ी जातियां भी जातिवाद से प्रभावित होकर लालू को वोट दे देती हैं । अगर पिछड़ी जातियां एकजुट होकर किसी ख़ास पार्टी को वोट दे देती हैं  तो अगड़ी जातियां भी तो एकजुट होकर किसी ख़ास दल को वोट करती ही हैं । पिछड़ों का एकजुट होना जातिवाद है तो क्या अगड़ों का एकजुट होना जातिवाद नही है ?

कार्यकर्ता में कुछ ज़्यादा ही आत्मविश्वास होना
लोकसभा में शानदार जीत से बीजेपी के कार्यकर्ताओं में आत्मविश्वास का गज़ब का वृद्धि हुई । नरेंद्र मोदी की बढ़ती लोकप्रियता से कार्यकताओं को बल मिलता जा रहा था । उनके बात करने के ढंग से ऐसा लगता की देश के विकास की एकमात्र तरीका बीजेपी के ही पास है । चाय के दुकानों में , पान के दकानों में या कोई भी सामूहिक जगह जहाँ राजनीति पे बहस होती वहाँ बीजेपी के लोग दूसरों पर हावी नजर आते , अपनी बात को ही अंतिम सच बताते । बहस में उग्र हो जाते । कोई अगर बीजेपी या मोदी की आलोचना कर दे तो उससे उलझ पड़ते । कई बार बात बढ़ भी जाती । ऐसे लोग जो बीजेपी के लोगों से प्रताड़ित , लज्जित हो चुके थे वो इस चुनाव में अपना बदला बीजेपी के खिलाफ वोट दे कर चूका लिए । उन्हें लगा की बीजेपी की हार कार्यकर्ताओं की उनकी हैसियत बताएगी लोकतंत्र में ।

हवाई विकास और ज़मीनी विकास 
लोकसभा चुनाव में प्रचार दे दौरान श्रीमान श्री नरेंद्र मोदी जिस तरह गरज गरज कर लोगों के यह बता रहे थे की विकास कितना जरुरी है और यह विकास केवल और केवल मैं कर सकता हूँ  लेकिन न सभी वादों का हिसाब बिहार के इस चुनाव में मांगा गया । क्यों की श्रीमान श्री नरेंद्र मोदी की सरकार बने 18 महीने हो चुकी थी । हिसाब देने और अपने किये विकास बताने के लिए मोदी के पास स्वच्छ भारत अभियान और जनधन खाता के आलावा कुछ नही था ।मोदी की  विकास की सारी बाते हवाई ही लगी । और बात बिहार की जनता अच्छे से समझ गयी । वही जनता के पास नीतीश कुमार का भी विकास था । जो दिख भी रहा था और जमीनी भी था । लोगों ने जमीनी विकास को चुना और हवाई विकास जिस हेलीकॉप्टर से आया था उसी से लौट गया ।


आर एस एस प्रमुख मोहन भगवत का बयान
आरक्षण पर दिए भागवत साहब का बयां बिहार के लिए टर्निंग पॉइंट रहा । बिहार के मतदाता जो विकास की बात समझने लगे थे जो अब मुद्दों पे अपनी राय रखने लगे थे । भागवत के बयां से उनमे जातीय अस्मिता , जातीय पहचान को फिर से जगाने का काम किया । वो अब जाति के नाम पर एकजुट होने लगे । जो की बीजेपी के हार का कारण बना । लेकिन सवाल है की क्या भागवत साहब यह बयां जान बुझ कर दिया ताकि बीजेपी हारे और मोदी की अपनी हैसियत का पता चले । मोदी का घमण्ड टूटे । यह बात भविष्य में ही पता चलेगा ।

नरेन्द्र मोदी की जो छवि बिहार चुनाव से पहले एक अपराजेय और प्रभावशाली नेता की थी । वह छवि अब धीरे धीरे टूटने लगी है । उनका विरोध पार्टी के अंदर भी शुरू हो गया है । नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के बाद सरकारी पैसे इस्तेमाल विदेशों में घुम कर अपनी छवि

चमकाने का कर रहे थे , और जो थोड़ी बहुत छवि भी थी एक ही झटके में बिखर गया । पहले तो विश्व भर में भारत के प्रतिष्ठित साहित्यकारों , कलाकारों , वैज्ञानिकों का पुरस्कार वापस करना और बाद में पुरस्कार वापस करने वालों पर ओछि टिप्पणी कर मोदी सरकार अपनी और नरेंद्र मोदी की छवि धूमिल कर ली । रही सही कसर बिहार चुनाव में पार्टी की करारी हार ने पुरी कर दी । नरेंद्र मोदी साल भर जिन देशों में घुम-घुम कर खुद को भारत का चक्रवर्ती सम्राट बता रहे थे , उन देशों के अखबार बिहार में मोदी की हार को इनके काम पर रेफरेनडम के तौर पर देख रहे थे । एक ही झटके में कहां से कहां पहुंच गए। लोकसभा चुनाव के प्रचार जिस मोदी की आलोचना विरोधी खेमे के बड़े नेता भी नही कर पाते थे आज इनकी आलोचना विरोधी पार्टी का आम कार्यकर्ता भी तर्क और प्रमाण के साथ करता है ।

बिहार चुनाव – एक नजर
इस चुनाव में सबसे ज्यादा सीट(80) जीतकर लालू यादव की पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी उसके बाद नीतीश कुमार की पार्टी ने 71 सीट जीता । इस चुनाव में कांग्रेस भी अपनी खो जमीन 27 सीटें जीतकर वापस पा ली । कुल मिला कर महागठवंधन को 178 सीटें आईं ।
दूसरी ओर एन.डी.ए में भारतीय जनता पार्टी को 53 सीटें रामविलास पासवान की पार्टी को 2 सीटें , उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को 2 सीटें और जीतन राम मांझी की पार्टी को केवल 1 सीट आई । इस चुनाव में सरकार तो महागठबंधन की बनेगी पर इस चुनाव में जीत के हीरो कई और भी हैं । मोकामा से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं अनन्त सिंह दोनों गठबंधन को हराते हुए इस सीट पर अपनी बादशाहत कायम रखी । वहीं बोच्चा सीट पर निर्दलीय चुनाव लड़ रही बेबी कुमारी ने मंत्री रमई राम को 24 हजार से हराया । निर्दलीय चुनाव लड़ने वालों में कांति सीट से अशोक कुमार चौधरी ने 9 हजार से चुनाव जीता , वाल्मिकी नगर से धीरेंद्र प्रताप ने 33 हजार से चुनाव जीतें । इस चुनाव से वर्षों से बिहार विधान सभा से बाहर चल रहे भाकपा(माले) ने वापस प्रवेश ले लिया है । माले ने बलरामपुर सीट से बीजेपी को 20419 वोटों को अंतर से हराया , दरौली सीट से माले के सत्यदेव राम ने 9500 हजार से जीता , और तरारी सीट से सुदामा प्रसाद ने लोजपा को हराते हुए यह सीट 272 वोट से जीता । कुल मिला कर माले ने 3 सीट जीतें । वही मिनी मॉस्को कहा जाने वाला बेगूसराय जो की वामपंथियों का गढ़ माना जाता है , इस चुनाव में एक भी सीट नही जीत पाई । ऐसा 60 साल में पहली बार होगा की सीपीआई को बिहार विधानसभा में जगह नही मिल पाएगी ।
अब नई सरकार महागठबंधन की जो बनेगी वह चुनाव में खुद को पिछड़ों गरीबों की बताती रही है अब उसके सामने समान शिक्षा प्रणाली और भूमि सुधार लागु करके खुद को वास्तिविक में गरीबों की हितैषी साबित करना होगा ।
आखिर में , यह चुनाव इसलिए कम याद रखा जाएगा इसमें कौन जीता बल्कि इसलिए ज्यादा याद रखा जाएगा कि इसमें कौन हारा ।

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