कविता : मैं वही पीपल हूँ

कविता




मैं वही पीपल हूँ



था मैं विशाल एक दिन
मेरे तन खुले व्योम में अनवरत बढ़ते हुए
शाखा ऐसी फैली थी मानो हर दिशा को जानती हो
इन्द्रधनुष मानो मेरे पत्ते से ही पाया रंग हरा
मेरी छाह जिसने सिखाया चांद को शितलता देना

मैं वही पीपल हूँ
जिसने देखा है एक शिशु से शिशु बनने का सफर
जिसने पाया दुलहिन से बुढ़िया होने का दर्शन
जिसके नीचे खेल बढ़ी हैं कई पीढि़याँ
आह ! आँखे चमक उठती सोच वे उठती सोच बाते
मेरे पत्ते को नहाता वे बरसाते

पर आज
झर गए हैं मेरे कोमल पत्ते
उड़ चला है परिंदो का बसेरा
भूल गई मेरी शाखाएँ दिशाओं को
कटा पड़ा हूँ
अपने ही बच्चों के हाथों
जिसके नीचे खेल काटे थे
वे बचपन  के दिन
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