प्रोफ़ेसर डम्बलडोर हैरी से कहते हैं कि "शब्द जादू से कम नहीं होते। इनमें अपार शक्तियां होती हैं। यह दुख दे भी सकते हैं और दुख भर भी सकते हैं"।  हैरी पॉटर सीरीज का यह कथन हमेशा लिखते-पढ़ते मेरे साथ बैठा रहता है। इस उम्मीद में की भाषा को साध सकूं। लेकिन भाषा को तो साध पाना कठिन साधना करने जैसा है। जीवन के कई साल गुजर जाते हैं, भाषा के इस जादू को सीख पाने में।

प्रेम की भाषा में जादू होता है। प्रेम पत्रों के हर एक शब्द अपने में अथाह शक्ति समाए रखता है। साथ ही विरह में भी आदमी कोमल शब्दों को उतनी ही बेचैनी से ढूंढता है। चूंकि प्रेम ही जादू जैसा होता है। बहरहाल प्रेम से इतर शब्दों का जादू कितना प्रबल होता है यह मार्खेज का उपन्यास 'वन हंड्रेड ईयर ऑफ सोलिटुड' से गुजरते हुए जाना। मार्खेज पूरी दुनियां भर में पढ़ें गए, लेकिन मेरा यह दुर्भाग्य कि पहली बार उनका उपन्यास उनके गुजर जाने के चार साल बाद पढ़ा पाया.
शहर का एकांतवाश
'वन हंड्रेड ईयर ऑफ सोलिटुड' एक शहर के जन्म लेने, बढ़ने और उसके खत्म होने की कहानी बयाँ करता है. यह शहर है मोकोंदो, जो पूरी दुनियां से कटा हुआ है. यह कटाव इस कदर है कि यहाँ के लोगों को कई चीजों के नाम तक नहीं पता होता. बर्फ जैसी चीज का होना भी यहाँ एक जादू जैसा है. शहर का यह एकांतवाश ही मेरे लिए सम्मोहन पैदा करता है. बुएन्दिया परिवार इस पूरे शहर के केंद्र में है. बुएन्दिया परिवार के सात पीढियां इसी शहर को बनाती हुई यही दफन होती है.
मार्खेज का जादू
मार्खेज़ कहानी बुनते समय अपने कल्पना के इतने रंग भर देते हैं कि चीजें असाधारण और अविश्वसनीय लगने लगती है. बावजूद इसके मुझे मार्खेज का जादू इस न मनाने वाली चीजों को भी मानने को विवश कर देता है. कल्पना से भी परे घटनाएं भी हर रोज की साधारण घटना लगती है. प्राय: यथार्थवादी उपन्यासों के साधारण से लगने वाले किरदार को किताब खत्म होने के साथ भूलने लगता हूँ. लेकिन याद रहता है वह किरदार जो सपनों में बनना चाहते हैं, जो बिलकुल ऑफ दिस वर्ल्ड हो. जैसे किताब पढ़ने के बाद मुझे याद रह जाता है कि मोकोंदो में बारिश भी होती है तो चार साल के लिए, एक आदमी मौत से लौट कर वापस आ जाता है , एक लड़की इतनी खुबसूरत होती है कि कई लोग उसके खिड़की पर अपना जान दे देते हैं और उसे कोई फर्क तक नहीं पड़ता. एक औरत अपने मरने की भविष्यवाणी खुद से करती है और दो साल तक अपना कफ़न तैयार करते हुई गुजारती है. किरदारों के विचित्र कारनामें पढ़ते हुए कभी-कभी किताब के फेरीटेल्स होने का भ्रम जागता है, लेकिन पैरलल चलता रिअलिज्म किताब पढ़ें जाने के सुख को और भी बढ़ा देता है.

एकांतवाश का प्रेम

प्रेम की कोई परिभाषा तय नहीं है. जितने तरह के आशिक होंगे उतने तरह के प्रेम होंगे. लेखक के साथ भी यही है. जैसा लेखक वैसी प्रेम कहानी. 'वन हंड्रेड ईयर ऑफ सोलिटुड' का प्रेम भी किताब के जैसा विराट है. हर किरदार का प्रेम उतना ही विचित्र और अनोखा. एक लड़की है मेमे जिसका प्रेमी हर शाम उससे मिलने आता है, प्रेमी के साथ आती हैं बहुत सारी पीली तितलियाँ. प्रेमिका का कमरा पीली तितलियों से भरा होता है, यह तितलियाँ तब तक प्रेमी के पास रहती हैं जब तक वह जिन्दा रहता है. एक आदमी शादीशुदा होने के बावजूद एक पराई औरत के लिए निष्ठावान रहता है , और वह पराई औरत अपने प्रेमी के गुजर जाने के बाद उसके घर के खर्चा उठाए रहती है. एक नौजवान अपने से कई साल छोटी लड़की से एक नजर का प्यार कर बैठता है , जिसे अक्षर ज्ञान तक पता नहीं होता. और वह नौजवान उसे अक्षर ज्ञान सिखाता उसके बड़ा होने का इंतजार करता है. एकांतवाश का प्रेम सही गलत से परे होता है, उम्र , संबंधों और समाज के बंधन से मुक्त होता है. यह एकांतवाश ही आजादी के सही मायने बताता है.  

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       मैं बंद है रात के अँधेरे कमरे में , बेचैन और डरा हुआ. अचानक पश्चिम के दरवाजे पर किसी की दस्तक होती है, मैंडरता हुआ किवाड़ खोलता है, लेकिन सामने कोई नहीं होता. डर और बेचैनी में वह गैलरी में जाकर देखता है, वहां से मैंको वाइट हाउस दिखता है, सबसे पुराने लोकतन्त्र में एक अलोकतांत्रिक व्यक्ति का शपथ ग्रहण हो रही है. मैं वापस अपने अँधेरे कमरे में चला आता है, वह नींद की गोलियां खोजता है, आज उसे इसके बिना नींद नहीं आएगी. लेकिन इस बार पूरब के दरवाजे पर किसी के संकाल पीटने की आवाज आती है. मैं द्वार खोलता है, लेकिन फिर सामने कोई नहीं होता, मैं फिर गैलरी में जाता है, देखता है की किसी प्राचीन से शहर में एक आदमी हजारों के हुजूम के साथ सड़कों पर चला जा रहा है. किनारों पर खड़े लोग उसका नाम पागलों की तरह चिल्ला रहे हैं. उस शोर की आवाज से मैंका कान फटा जा रहा  है, उसकी कानों से खून निकल आता है. मैंवापस अपने कमरें में आ किवाड़ बंद कर लेता है. अँधेरे में ही मैंअपने कान का खून साफ़ कर रहा होता है कि फिर उत्तर के दरवाजे के पीटने की आवाज आती है, इस बार चिढ़ में मैंदरवाजा नहीं खोलता. उत्तर के दरवाजे का शोर खत्म नही होता है कि दक्षिण का द्वार कोई पिटने लगता है. एकाएक उसके कमरें की दीवार गायब हो जाती है, दीवारों की जगह किवाड़ें आ जाती हैं, फ्रांस,सीरिया, तुर्की,कोरिया, रूस, तिब्बत, कश्मीर,चीन का किवाड़, और सारे दरवाजे एक साथ पीटे जाने लगते हैं.  ‘मैं’ को अब नींद की गोली खाने के बाद भी नींद नहीं आ रही है, मन बेचैन है, ऑंखें फड़क रही हैं, होठ बुदबुदाएं जा रहे हैं.

                        मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ और जॉर्ज ओरवेल की नॉवेल ‘नाइनटीन एट्टी-फोर’ फैंटसी में रची गयी कालजयी रचना है. दिलचस्प बात यह है कई दशक पहले लिखी गयी ये दोनों रचना वर्तमान में बहुत ज्यादा प्रासंगिक हैं. एशिया से खाड़ी देश तक और यूरोप से अमेरिका तक अधिनायकवादी सोच का फैलाव तेज़ी से हो रहा है. राष्ट्रवादी उन्माद, धार्मिक कट्टरता से सारे जरुरी मुद्दे गौण हो गये हैं. दम तोड़ रहे पूंजीवाद से त्रस्त जनता फासीवादियों के पीछे खड़ी होने लगी है. देश की नागरिकता से ज्यादा महत्वपूर्ण अब किसी पार्टी की सदस्यता हो गयी है और पार्टी का अंतिम और सबसे जरुरी आदेश है की अपने कान और आंख पर विश्वास करना छोड़ दो (जॉर्ज ओरवेल ,1984). अगर कोई पार्टी का आदेश नहीं मनाता है,अपने आँख,कान,दिमाग का इस्तेमाल करता है तो उसके लिए रूम नंबर 101 है,जहाँ पता किया जाता है मस्तक-यन्त्र में कौन विचारों की कौन-सी ऊर्जा, /कौन-सी शिरा में कौन-सी धक्-धक्/कौनसी रग में कौन-सी फुरफुरी/कहाँ है पश्यत् कैमरा जिसमें तथ्यों के जीवन-दृश्य उतरते. प्रतिरोध में बोलने वाले व्यक्ति की आत्मा तक को ढूंढा जाता है कहाँ है सरगना इस टुकड़ी का/ कहाँ है आत्मा? क्यों कि बिग ब्रदर का फरमान है स्क्रीनिंग करो मिस्टर गुप्ता/ क्रॉस एक्जामिन हिम थॉरोली (अँधेरे में ).

मुक्तिबोध के ‘अँधेरे में’ निकलने वाला फासीवादी दल अब उजाले में बेख़ौफ़ निकलता है. उसे अब बेनकाब होने का डर नहीं, अब वह नहीं कहता की आधीरात--अँधेरे में उसने/ देख लिया हमको / जान गया वह सब/ मार डालो, उसको खत्म करो एकदम. क्यों की देश के नागरिक फसिसिम को सेलिब्रेट करने लगे हैं. उन्हें बता दिया गया है की अल्टरनेटिव फैक्ट ही आज का सत्य है और सत्य एक कोरी बकवास.अधिनायकवाद ही लोकतंत्र का संरक्षक है और सेंसरशीप ईश्वरीय वरदान. उन्माद ऑक्सीजन है, धार्मिक कट्टरता राष्ट्रीय पहचान और जनता मान चुकी है युद्ध ही शांति है, पराधीनता ही स्वतंत्रता है, अज्ञानता ही बल है(जॉर्ज ओरवेल,1984). लेकिन फसिसिम को सेलिब्रेट करने के दौर में राष्ट्र की अवधारणा खंडित हो रही है, राष्ट्र ध्वज के कपडे चीथड़े होते जा रहे हैं, और राष्ट्र गान बेसुरा होता जा रहा है. अँधेरे कमरें का मैं इस राष्ट्रगान से दूर भाग कर, उस सर–फिरे जन का गीत सबको सुनाना चाहता है अब तक क्या किया / जीवन क्या जिया / ज़्यादा लिया और दिया बहुत-बहुत कम / मर गया देश, अरे जीवित रह गये तुम (अँधेरे में )

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अधिनायकवाद के खिलाफ लिखे गये नॉवेल 1984 की बिक्री ट्रम्प के शपथ ग्रहण के बाद से सिर्फ अमेरिका में 9500 प्रतिशत बढ़ गयी, ब्रिटेन में 20 प्रतिशत बढ़ गयी है और दुनिया भर में फिर से पढ़ा जाने लगा है. इस नॉवेल का अप्रत्याशित रूप से पढ़ा जाना कोई बड़ा बदलाव भले न लाए लेकिन नाउम्मीदी और बेतहाशा के समय में उम्मीद जगाता है कि हमारी प्रतिरोध की संस्कृति दरिद्र नहीं हुई है.अँधेरे कमरे में बंद ‘मैं’ का किवाड़ पिटा जा रहा है और उसे जगाया जा रहा है. इसी उम्मीद पर मुक्तिबोध कहते हैं  कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ / वर्तमान समाज चल नहीं सकता/ पूँजी से जुड़ा हुआ हृदय बदल नहीं सकता / स्वातन्त्र्य व्यक्ति वादी / छल नहीं सकता मुक्ति के मन को /जन को.


                                                            *****
     

करीब साल भर पहले बिमल रॉय की फिल्म देखी थी दो बीघा जमीन.
60 के दशक में बनी इस फिल्म के दृश्य और संवाद के कट आउट निकाल के कमरें की दीवार पर लगायें तो पूरी दिवार भर जाएगी. लेकिन फिल्म का एक खास दृश्य बेहद बेचैन कर देने वाला लगा. बलराज साहनी अभिनित इस फिल्म में एक दृश्य ऐसा है जहाँ किसान से मजदूर बना पिता जब बीमार हो जाता है, तो बीमार बाप के इलाज़ के लिए बेटा चोरी के पैसा से दवाई खरीदकर ले जाता है. यह जान बाप गुस्से में बेटे को पिटते हुए कहता है कि “किसान का बेटा होकर चोरी करता है तेरी मां सुनेगी तो शर्म के मारे जान दे देगी.”
आज देश की राजनीति यह है की लाखों करोड़ों का अनाम चंदा लेकर, लाखों रूपए से बने मंच पर एक आदमी आलीशान हेलिकॉप्टर से आता है और चीखता हुआ कहता है कि मैं किसान का बेटा हूँ, मजदूर का बेटा हूँ आप मुझे वोट दो और जनता उसका नाम पागलों की तरह चिल्लाती है. अगर कोई पूछे बैठे कि यह लाखों का चंदा कौन दिया है तो उसके माथे पर एंटी नेशनल लिख दिया जाता है. काश चोरी से पैसे कमाना बलराज साहनी की को आ जाता तो उनका दो बीघा ज़मीन नीलाम न होता.
दिल्ली में तमिल नाडू के किसान महीने भर से प्रदर्शन कर रहे हैं, फसल बर्बादी हो जाने पर लोन माफ़ करने के लिए यह किसान हर संभव तरीके अपना रहे हैं ताकि सरकार का ध्यान पड़े. लेकिन लोकतान्त्रिक और समाजवादी गणराज्य की सरकार इनसे बात करने तक नहीं आई. आदिम राजतन्त्र से भी ज्यादा भयावह है यह दृश्य . किसानों द्वारा सड़क पर नंग प्रदर्शन से लेकर मूत्र पीना देश के लोकतन्त्र खोखला और आदर्शहीन साबित करता है.

                                                भारतीय चारण काल के इस स्वर्ण युग में मीडिया से उम्मीद ही बेकार है और बिहार से दिल्ली तक अधिनायक ही सत्ता पर बैठे हैं . एक गांधी के मूर्ति के पीछे से तुगलकी फरमान सुनाता है तो एक गांधी के माथे पर चढ़. लेकिन किसानों का दोहन सब जगह है. आज शांतिपूर्ण तरीके से लोन माफ़ कर रहे किसानों की गुहार कोई नहीं सुन रहा , लेकिन कल ये किसान हथियार उठा ले तो सरकार हजारों करोड़ रूपये ऑपरेशन ग्रीन हंट में फूंकने में ज़रा भी देर न लगाएगी. सरकार के इन्हीं नाकामियों पर कवि अनुज लुगुन की कविता है -
कुछ तो है ज़रूर, साहब !
जो आदिम जनों की
आदिम वृत्ति को जगाता है
कुछ तो है
कुछ तो है ज़रूर, साहब !

आप ही के गिरेबान में
वरना कोई भी ’गढ़’
यूँ ही ’लाल’
नहीं होता

हर दल चुनाव में किसानों के भले के लिए काम करने की बात करती है , लेफ्ट-सेंटर-राईट सब. लेकिन सब के हाथ किसानों के खून से रंगे हुए हैं, हजारों किसानों पर आत्महत्या पर अय्याशी करते राईट हो या नंदीग्राम, सिंगुर बनाते लेफ्ट.
                       लोकतान्त्रिक और समाजवादी गणराज्य के किसानों की उम्मीद सरकार से है वो तो सुन नहीं रही , लेकिन जनता ही जब किसानों के समस्या से मुंह फेर ले तो इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या होगा. नेताओं के घरों में तो आईना होता नहीं की यह खुद से नज़र मिला पायें , लेकिन हम सब के घरों में आईना जरुर होता है , और हमें खुद से नज़र मिलाना पड़ता है . कहीं ऐसा न हो की हमें खुद से नज़र मिलाने से कतराने लगे . इसीलिए जरुरत है हम सब को कि किसानों की समस्या पर बोले, उनके हित में सरकार को विवश करें फैसला लेने के लिए . पार्टी और सरकार दस साल पन्द्रह साल में बदलती रहती है, लेकिन किसान हजारों वर्ष पहले से हैं और लाखों वर्ष बाद भी रहेंगे. लेकिन आज यह किसान खुद को किसान मनाने में शर्मिंदा होने लगे , तो कितना भी हम मंगल पर चल जाएं मातृभूमि के इन पुत्रों के क्रंदन से हम भाग नहीं सकते .



  

2017 रूस की क्रांति का शताब्दी वर्ष है . सौ साल पहले हुए इस क्रांति की चमक का  मानव विकास की पट्टी पर आज तक धुंधली नहीं हुई है न आने वाले कल में होगी . वर्षों से जारशाही की पीढ़ा झेल रहे रूस में 25 अक्तूबर 1917 को ऐसी लकीर खिंची गयी जो आज तक कायम है . जिस समाजवाद को यूटोपियन सोसाइटी माना जा रहा था उस समाजवाद को रूस की क्रांति ने जमीन पर स्थापित किया . इस महान क्रांति का प्रभाव विश्व के चिंतक , दार्शनिक , वैज्ञानिक , लेखकों  पर पड़ा . क्रांति से प्रभावित भारत के लोग इस क्रांति का स्वागत श्रद्धाभाव से किए . रामवृक्ष बेनीपुरी रूस की क्रांति से बेहद प्रभावित , क्रांति के प्रभाव में ही उन्होंने 1931 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना किये. इसी प्रभाव में 1942 से 1945 के बीच हजारीबाग जेल में रखते हुए रूस की क्रांति किताब लिखी . जो लियोन त्रात्स्की की History Of Russian Revolution  पर आधारित हैं

यह किताब शुरू होती है प्रथम विश्व युद्ध के रूस से जब किसानों को फौज में भर्ती किया जा रहा होता है और मोर्चे पर लड़ रहे सैनिक युद्ध से ऊब चुके रहते हैं. फरवरी क्रांति की जमीन तैयार हो चुकी रहती है , किसानों , मजदूरों और बाद में सैनिकों के दम पर जारशाही उखाड़ फेक दे जाती है . लेकिन किताब का मुख्य भाग फरवरी क्रांति से अक्टूबर क्रांति के बीच के उथल पुथल है ।

रूस की क्रांति पर मैंने कई किस्से सुने हैं लेकिन सब टुकड़ों में । यहाँ वहाँ कुछ पढ़ा भी तो सिलसिले वार तौर पर नहीं बस किसी का घटना का प्रसंग । बेनीपुरी जी रूस के घट रहे हर एक घटना का विस्तार से वर्णन लिखते हैं जारशाही के बन्दूकों से निकले हर एक गोली का दिशा बताते हैं । जारशाही से अक्टूबर क्रांति के बीच हुए कारखानों में अधिकांश हड़ताल का ज़िक्र करते हैं । गर्भ में क्रांति के विकास के हर पल का वर्णन करते हैं

किताब रूस की क्रांति का ज़िक्र करती है लेकिन इसमें कई पहलु छूट गए हैं। क्रांति की ज़मीन तैयार करने में राजनितिक लोगों के योगदान को बखूबी दिखती हैं लेकिन रूस के साहित्य का वहां के किसानों और मजदूरों पर क्या प्रभाव हुए इस पहलु को ज़रा भी छूआ नहीं गया है। रूस के विश्व साहित्य में योगदान देने वाले लेखकों का महत्वपूर्ण काम को बेनीपुरी जी छोड़ गए हैं। किताब का एक दूसरा कमजोर पक्ष यह लगा की किताब में बोल्शेविक पार्टी के नेताओं के तुलना में फरवरी क्रांति के बाद बनी सरकार के लोगों पर ज़्यादा पन्ने दिए गए हैं। बेनीपुरी जी की यह किताब ट्राटस्की की किताब पर आधारित है सो यहाँ भी ट्राटस्की का ही एंगल ज़्यादा आ आता है। स्टालिन पर बेहद कम लिखा गया है।

महत्वपूर्ण काम किया है गार्गी प्रकाशन ने लगभग 70 वर्षों तक अप्रकाशित रामवृक्ष बेनीपुरी की इस महत्वपूर्ण किताब को छापा . सौ वर्ष पूर्व में घटित स्वर्णिम घटना को नई पीढ़ी के लिए बताने का काम किया है .
                                  किताब में एक चैप्टर है बोल्शेविक और सोवियत . यह चैप्टर भारत के , विश्व के किसी भी जगह के पार्टियों ( जो क्रांति के पक्षधर हैं ) के लिए उपयोगी है . यह चैप्टर बताता है की रूस में क्रांति करने वाली बोल्शेविक पार्टी और जनता के बीच कैसे सामंजस्य थे . बोल्शेविक लोग जनता को कैसे समझते थे. बेनीपुरी जी लिखते हैं ---- 

''क्या बात है की पार्टी का संघठन इतना ढीला होने और साधनों की इतनी कमी होने के बावजूद बोल्शेविकों के विचार और नारे इतनी तेज़ी से लोगों में फ़ैल गये ? इसकी कैफियत बहुत सीधी थी. बोल्शेविकों ने जो नारे थे, वे जनता की मनोवृति और जरूरतों को सही सही प्रकट करते थे, वे जमाने के प्रतिक थे और जमाना अपने लिए हजारों रास्ते बना लिया करता है. लाल गरम क्रांतिकारी तारों के जरिए विचारों की बिजली एक क्षण में दूर दूर तक जा पहुँचती है बोल्शेविकों अखबारों जो जोरों से पढ़ा जाता था, टुकड़े टुकड़े करके पढ़ा जाता था अच्छे लेखों को लोग कंठस्थ कर लेते थे उन्हें जबानी सुनाते थे, उनकी नक़ल करते थे जहाँ संभव होता फिर छाप लेते थे, ‘प्रावदा’ के लेखों का मोरचों पर ये सैनिक इसी तरह से आपस में प्रचार करते थे. हवाई डाक, साईकिल, मोटर साईकिल – सबका प्रयोग वे उसके जल्द प्रचार के लिए करने में नहीं चुकते थे.
                                                 बोल्शेविकों के नारों का सीधा साधा होना भी उनके शीघ्र प्रचार का एक प्रमुख कारण था. जहाँ दुसरे पार्टियाँ हर बात को पंडिताऊ बनाने की कोशिश करतीं, वहां बोल्शेविकों उन्हें इतने सरल ढंग से रखते की जनता के निम्न स्तर के लोगों को भी समझने में देर नहीं होती. बोल्शेविकों ने नारे सीधे-साधे होते वे जनता के अनुभवों को उनके ही शब्दों में प्रकट करते श्रमजीवी जनता अपने संघर्षों में सिर्फ मांगों और जरूरतों से ही प्रेरित नहीं होती, उनकी ज़िन्दगी के तीखे-कडुवे अनुभव भी उनका पथ प्रदर्शन करते हैं. बोल्शेविकों के ह्रदय में जनता है जीवन के स्वतंत्र अनुभवों के लिए ऊँचे खानदान के लोगों की तरह घृणा नहीं थी बल्कि उन्हीं के अनुभवों के आधार पर वे अपने नारों के सही और सच्चे होने की परख करते.''

रूस की क्रांति

रामवृक्ष बेनीपुरी
गार्गी प्रकाशन
gargiprakashan15@gmail.com
पृष्ठ- 318   
मूल्य – 150
ISBN – 81-87772-55-7

देखो हत्यारों को मिलता राजपाट सम्मान
जिनके मुँह में कौर माँस का उनको मगही पान

प्राइवेट बन्दूकों में अब है सरकारी गोली
गली-गली फगुआ गाती है हत्यारों की टोली
देखो घेरा बांध खड़े हैं ज़मींदार की गुण्डे
उनके कन्धे हाथ धरे नेता बनिया मुँछ्मुण्डे
गाँव-गाँव दौड़ाते घोड़े उड़ा रहे हैं धूर
नक्सल कह-कह काटे जाते संग्रामी मज़दूर
दिन-दोपहर चलती है गोली रात कहीं पर धावा
धधक रहा है प्रान्त समूचा ज्यों कुम्हार का आँवा
हत्य हत्या केवल हत्या-- हत्या का ही राज
अघा गए जो माँस चबाते फेंक रहे हैं गाज

प्रजातन्त्र का महामहोत्सव छप्पन विध पकवान
जिनके मुँह में कौर माँस का उनको मगही पान

कवि अरुण कमल जब यह कविता लिख रहे होंगे तो निश्चित ही उनके मन में अस्सी , नब्बें के दशक की बिहार की पीड़ा होगी. जब जमींदार का आतंक होता. जमींदार के खेते में बेगार काम करना पड़ता. खेतों पर जमींदार का कब्ज़ा होता, जब जमींदार की बात ना मानाने पर उनके लोगों द्वारा पिटा जाता , यहाँ तक कि पिटते-पिटते मार देने तक की घटना सामान्य होती. लेकिन इसके विरोध में जब किसान मजदूर एकजुट होकर अपनी लड़ाई शुरू किये तो जमींदार द्वारा उन्हें खत्म करने की कोशिश की गयी . लेकिन आज भी जमींदार सामंत सरकार नेता पुलिस के गठजोड़ को कवि की कलम वर्षों बाद तक बयां करती है एकदम चट्टान की तरह .



अब दूसरा दृश्य है रामजस कॉलेज , दिल्ली यूनिवर्सिटी की . कल्चर ऑफ़ प्रोटेस्ट के विषय पर आयोजित सेमीनार को एबीवीपी के लोग इसे रद्द करा देते हैं यह कह कर कि इस सेमीनार में राष्ट्रद्रोह का आरोप झेल रहे उमर खालिद को क्यों बुलाया गया. लेकिन सेमीनार के पक्ष वाला छात्र समूह लेफ्ट छात्र संगठन विरोध प्रदर्शन करते हैं, इसी विरोध प्रदर्शन में एबीवीपी  के लोग पत्थर चलाते हैं, एबीवीपी के लोगों द्वारा प्रदर्शन कर रहे छात्रों को पिटा जाता है , इस पुरे घटना को पहले तो दिल्ली पुलिस मूक दर्शक बन कर देखती है बाद में एबीवीपी  के बचा हुआ काम दिल्ली पुलिस करने लग जाती है , प्रदर्शन कर रहे छात्रों को पिटती है , उन्हें पुलिस वैन में उठा के ले जाती है . इस पुरे घटना में सबसे शर्मनाक काम होता है एबीवीपी के लोगों द्वारा रामजस कॉलेज के इंग्लिश के प्रोफेसर का बुरी तरह पिटा जाना.

आप सोच रहे होंगे की मैंने बिहार उस सामंती दौर की ज़िक्र क्यों किया. कारण है की एबीवीपी के गुंडों द्वारा पिटा जाना बहुत से लोगों को फासीवादी लगती है लेकिन मुझे यह पूरी तरह सामंती सोच की घटना लगती है. जिस तरह इस पुरे घटना में पुलिस , सरकार इन गुंडों की सहयोगी बनती है बिहार के उसी दौर का ज़िक्र चला आता है. कई साल पहले लिखी कवि अरुण कमल की यह कविता आपको अभी के समय की कविता लगेगी. एंटी नेशनल कह कर विद्यार्थी , रिसर्च स्कॉलर , टीचर पिटे जा रहे हैं और सरकार पीटने वालों का साथ दे रही है . उनके मंत्री उनके साथ तस्वीर खिंचवाते हैं . इसलिए हाल के कुछ वर्षों में संस्कृति , राष्ट्रवाद को घटना जिस शैली में हुई है उन घटनायों में देखते हुए मुझे यह कहने में ज़रा भी हिचक नहीं है की जमींदारी और सामंती सोच वाले ये लोग राष्ट्रवाद और संस्कृति के नाम पर फिर से मारपीट कर रहे हैं .



एबीवीपी  @ दिल्ली यूनिवर्सिटी

दिल्ली यूनिवर्सिटी में होने वाले छात्र संघ के चुनाव में एबीवीपी का अच्छी पकड़ है. उनके उम्मीदवार हाल के वर्षों में लगतार जीत रहे हैं . लेकिन इस बात पर भी गौर करें की क्यों एबीवीपी अपना उम्मीदवार पूर्वांचल या नार्थ ईस्ट का नहीं बनाता. इसके उम्मीदवार दिल्ली के आस पास के अगड़ी जातियों के होते हैं. इन्हें बिहार के विद्यार्थी में क्या राजनीति के गुण नहीं मिलते जो जाट या गुज्जर जाति का उम्मीदवार बनाते हैं. साफ़ शब्दों में यह पूरी तरह सामंती और अलोकतांत्रिक संगठन है .

पटना के गांधी मैदान में 4 फरवरी को शुरू होने वाला 23वां पटना पुस्तक मेला 14 फरवरी को समाप्त हो गया। ग्यारह दिन तक चलने वाले इस पुस्तक मेला में दर्जनों किताबों का लोकार्पण हुआ , कई काव्य गोष्ठियों , पुस्तक अंश पाठ का आयोजन हुआ । साथ ही विभिन्न सामाजिक पहलुओं पर परिचर्चा भी आयोजित हुई ।
पटना पुस्तक मेला यूँ तो हर वर्ष नवंबर-दिसंबर के महीने में आयोजित किया जाता है लेकिन 350वें प्रकाश वर्ष के कारण दो महीने विलम्ब से शुरू हुआ। 4 फरवरी को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली इस पुस्तक मेला उद्घाटन किया । साथ ही पुस्तक मेला को राष्ट्रीय स्तर से अंतरराष्ट्रीय सलाह दी ।

क्या क्या हुआ ?

सी आर डी द्वारा आयोजित पुस्तक मेले का इस वर्ष का थीम कुशल युवा सफल बिहार रखा गया । युवा को कुशल बनाने के उद्देश्य से ही मेला में कार्यशाला भी रखा गया । कार्यशाला में क्लास 12 तक के बच्चों को कविता लेखन, कहानी लेखन, पेटिंग करना बताया गया । हिंदी फिल्म गीतकार राजशेखर ने बच्चों की कविताएं सुनी , कविताओं को और बेहतर बनाने की बात बताई साथ ही अपनी कविता सुनाई , फिल्म में गीत लिखने के अपने सफर को बताया ।
पुस्तक मेला में साहित्यिक पत्रिका पाखी द्वारा कवि सम्मेलन का आयोजन 5 फरवरी को किया गया । कवि आलोक धन्वा के अध्यक्षता में और पाखी के संपादक प्रेम भारद्वाज के उपस्थिति में सरेंद्र स्निग्ध ,राकेश रंजन , शहंशाह आलम , राजकिशोर राजन, प्रत्युष चंद्र मिश्रा, मुसाफिर बैठ, निवेदिता, आभा दुबे, स्मिता वाजपेयी, नाताशा ने अपनी कविताएं पढ़ी । कवि सम्मेलन में गीतकार राजशेखर ने भी अपनी कविताएं पढ़ीं . कार्यक्रम का अंत आलोक धन्वा द्वारा उनकी चर्चित कविता भागी हुई लड़की के अंश पाठ से हुई .

वहीं राजकमल प्रकाशन के स्टॉल पर कथाकार हृषिकेश सुलभ की नयी कहानी संग्रह के बाबत प्रेम भारद्वाज ने उनसे बातचीत की । हृषिकेश सुलभ से उनकी पहले की कहानियों और अब नये समय में बदल रहे कहानियों के संबंधित प्रेम भारद्वाज ने कई सवाल पूछे । बातचीत के क्रम में कथाकार हृषिकेश सुलभ ने अपनी कहानी अमली के ज़िक्र आने पर बताया की 'मुझे आज यह कहानी ज्यादा प्रिय नहीं है , यह कहानी सरल है और इसका कहानी का परिवेश भी नहीं रहा.
प्रेम भारद्वाज और हृषिकेश सुलभ

                                                    मेला में बिहार के दो ख्याति प्राप्त रचनाकार कुमार नयन की ग़ज़ल संग्रह और राकेश रंजन की कविता संग्रह दिव्या कैद खाने में का लोकार्पण आलोक धन्वा ने किया । राजकमल प्रकाशन के स्टॉल पर आयोजित लोकार्पण समारोह में डॉ शंकर प्रसाद ने कुमार नयन की एक ग़ज़ल का तरनुम से सुनाया । वहीं मेले में बने भोजपुरी मुक्ताकाश के मंच पर कथाकार अवधेश प्रीत और भावना शेखर की बातचीत अवधेश प्रीत के आने वाले उपन्यास 'अशोक राजपथ' के ऊपर हुई । बातचीत में भावना शेखर ने कई महत्वपूर्ण किये और अवधेश प्रीत ने उतने से संजीदगी से सारे जवाब दिए । स्त्री विमर्श के सवाल पर कथाकार अवधेश प्रीत ने सिमोन द बोउआर के कथन स्त्री पैदा नहीं होती बनाई जाती हैसे आज के समाज की हकीकत सामने रखी . अवधेश प्रीत से पुरे बातचीत का मुख्य केंद्र आज के समय में बढ़ रही औपचारिकता रहा. हाल के वर्षों में हिन्दू -मुस्लिम दो धर्मों के लोग जितने खुल के . स्वभाविक रूप से मिलते थे आज सब एक बनी हुई औपचारिकता में मिल रहे हैं .
अवधेश प्रीत बातचीत के दौरान
                                                   विश्व पुस्तक मेला , दिल्ली में लोकार्पित राजकमल प्रकाशन की महत्वाकांक्षी उपन्यास 'अकबर' के लेखक शाजी ज़मा ने भी पुस्तक मेला में पाठकों से अपनी बीस साल शोध के बाद लिखी पुस्तक 'अकबर' से बातचीत की. राजकमल प्रकाशन के सम्पादक सत्यानन्द निरुपम की उपज लप्रेक सिरीज़ की भी पुस्तक मेला में धूम रही. इश्क में माटी सोना के लप्रेककार गिरीन्द्रनाथ झा पुरे पुस्तक मेला में बने रहे . पाठकों से उनका मिलना हर दिन होता रहा. राजकमल के स्टाल पर लप्रेक सिरीज़ पर बातचीत भी रखी गयी. इस बातचीत में दिल्ली से इश्क कोई न्यूज़ नहीं के लप्रेक कार विनीत कुमार भी हिस्सा लिए . लप्रेक के उद्देश्य और इसकी सार्थकता पर विनीत कुमार कहते हैं की हम सब का उद्देश्य साल दो साल बैठ कर उपन्यास या किताब लिखना नहीं है , हर क्षण बदल रहे इस दुनिया में जो कहानी घट रही है , जो कहानी न्यूज़ रूम में , क्लास में , खेत में ,बाज़ार में बन रही है उन्ही कहानी को तुरंत फेसबुक पर लिख दिया . कभी सोचा नहीं की यह किताब की शक्ल लेगी .
सत्यानन्द निरुपम , विनीत कुमार , गिरीन्द्रनाथ झा

राजकमल से आई युवा लेखक क्षितिज रॉय की किताब गंदी बात पर विनीत कुमार ने उनसे बातचीत की. क्षितिज ने लेखन के दुनियां में अपने नए नए अनुभव
, किताब के पटकथा पर बातचीत के साथ किताब का अंश पाठ भी किया . अंश पाठ के क्रम में हृषिकेश सुलभ , अवधेश प्रीत ने अपनी 'अशोक राजपथ' का अंश पाठ किया .
क्षितिज रॉय , विनीत कुमार , गिरीन्द्रनाथ झा
                                                        २३ वे पटना पुस्तक मेला में शरीक हुए उदय प्रकाश , पत्रकार शशि शेखर भी आकर्षण के केंद्र रहे . वही मेले के आखिरी दिन बच्चों का कवि सम्मलेन का आयोजन बिहार बाल भवन द्वारा किया गया . बच्चों की कविता सुनने के लिए अच्छी खासी भीड़ जमा रही .मंच से आत्म विश्वास से भरे कविता सुनाते ये बच्चे इस पुस्तक मेला की खास उपलब्धि रहे . क्यों की आने वाले पीढ़ियों में कविता के संस्कार विकसित करना उन्हें आने वाले कल के लिए तैयार करना है.
मेले में आये उदय प्रकाश

पाठक बनाम फैन

साहित्य में आमतौर पर पाठक होते हैं जो लेखक से आत्मिक रूप से जुड़ते हैं जैसे कोई सगे संबंधी हो , लेखक भी पाठक से वैसा ही संबंध स्थापित करता है. लेकिन हाल के वर्षों में साहित्य में फैन कल्चर पनप रहा है, जो फेसबुक और ब्रांडिंग से और तेज़ी से बढ़ रहा है . आज पाठक लेखक से उसके कहानी , उसके किरदार , उसके प्लाट पर सवाल नहीं करता , उसे तो लेखक के साथ एक सेल्फी चाहिए बस. इससे ना लेखकों को पाठकों की आलोचना , उनके मत ज्ञात है , ना ही पाठक को किताब वाला लेखक और वास्तविक जीवन में लेखक के व्यक्तित्व का अंतर पता चलता है. फैन कल्चर का पटना पुस्तक मेला भी में बना रहा. तस्वीर और सेल्फी का दौर यहाँ भी खूब चलता रहा. यह फैन कल्चर का ही देन है कि लप्रेक पर चर्चा के लिए कुर्सियां भर जाती है , लोग खड़े होकर भी चर्चा को सुनते हैं . लेकिन उसके तुरंत बाद हृषिकेश सुलभ , अवधेश प्रीत के अंश पाठ को सुनने ज्यादा लोग नहीं आते , कुर्सियां खाली रह जाती हैं .

कविता : राम नाम सत्य है

चर्चित कवि आलोक धन्वा कहते हैं कि कविता हाथ में ली हुई वीणा है. यदि इसे हमारे बच्चे नहीं बजाएंगे, तो यह मनुष्य-विरोधी समय उठाकर इसे संग्रहालय में डाल देगा. यह वीणा नहीं बचेगी तो लोकतंत्र भी नहीं बचेगा.अरुण कमल , आलोक धन्वा का शहर है पटना और इस पटना में लगे पुस्तक मेला में कविताएँ हाशिये पर रही. आलोक धन्वा कविता का होना लोकतंत्र के होने से जोड़ते हैं. बावजूद इसके पटना पुस्तक मेला में खरीददार के हाथ में कविता की कविता नहीं दिखती. मेले में कई कवि सम्मलेन तो आयोजित किए गये , लेकिन पाठकों के ध्यान के लिए कविता संग्रह बाट जोहती रह गयी .

गार्गी प्रकाशन : देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर

गार्गी प्रकाशन का स्टाल कोने में लगी थी , छोटे से जगह में लगे इसके किताब और पोस्टर हर पाठकों का ध्यान खिंचती रही. रामवृक्ष बेनीपुरी की अप्रकाशित किताब रूस की क्रांति , लाल चीन , लाल रूस , कार्ल मार्क्स को गार्गी प्रकाशन ने काफी खोज बिन के बाद प्रकाशित किया . अंतिम दिन होते होते रामवृक्ष बेनीपुरी के किताबों की सारी प्रतियाँ बिक गयी. इन किताबों के अलावें गार्गी ने फिदेल कास्त्रों पर , क्यूबा की क्रांति , रुसी उपन्यास , गोर्की की कहानियां पर कई किताबों काफी बिकी. मार्क्सवाद परिचय माला के टाइटल से गार्गी ने पांच पुस्तिका का प्रकाशन किया है. जो मार्क्सवाद , पूंजीवाद , राजसत्ता , समाजवाद के गहन जानकारी को सरल और सुलभता से पाठकों को उपलब्ध करता है. गार्गी प्रकाशन के पोस्टर भी कई पाठकों के हाथों में देखी गयी.
रामवृक्ष बेनीपुरी की किताबें
मार्क्सवाद परिचयमाला
पोस्टर

मेड इन इंडिया

मेला में मेड इन इंडिया के थीम पर पेंटिंग्स , पुआल आर्ट , हैण्ड मेड आर्टिस्टिक वस्तुओं का भी स्टाल लगा था . मिथिला पेंटिंग , खिलौने , मूर्तियाँ मेले में आये लोगों का ध्यान आकर्षित रहीं . मेले में लगे खाने-पीने के लिए लिट्टी चोखा , फ़ास्ट फ़ूड के स्टाल पर लोगो की भीड़ काफी रही.

Pustak mela se ..

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कुल मिलाकर इस बार के पुस्तक मेले में भीड़ और साल की तुलना में कम रही , पाठक भी किताब उलट पुलट देखते लेकिन दाम देख मन मसोस कर किताब वापस रख देते . किताबों के दाम तेज़ी से बढ़ रहा और वो उस समय में जब मध्य वर्ग के पाठकों के प्राथमिकता से किताब दूर जाती दिख रही है

अलोक धन्वा का कविता पाठ 'भागी हुई लड़की' - http://bit.ly/AlokDhanva

राज शेखर का कविता पाठ - http://bit.ly/Rajshekhar

कवि सम्मलेन का वीडियो - http://bit.ly/KaviSammelan

पुस्तक मेले के तस्वीरें - http://bit.ly/PatnaPustakMela

लप्रेक पर बातचीत की तस्वीरें - http://bit.ly/PatnaPustakMela2

उदय प्रकाश की तस्वीरें - http://bit.ly/UdayPrakash

कवि सम्मलेन की तस्वीरें - http://bit.ly/KaviSammelanPics

दुनिया का सबसे खतरनाक हथियार क्या है ? जिसके एक बार चल जाने के बाद पूरा का पूरा इलाका में सन्न रह जाये ? आप कहेंगे कि एटम बम या फिर हाइड्रोजन बम. तो साहब आज तक आप भ्रम में हैं. इन सब से भी एक खतरनाक हथियार है. सौभाग्यवश उस हथियार का खजाना है भारत के पास. सभ्यता और संस्कृति का हथियार. कहीं एक बार एटम बम चल जाए तो आदमी मर जाएगा है , आने वाली पीढ़ी अपंग पैदा होगी. लेकिन उनका विचार नष्ट नहीं हो जायेगा , सोच रहेगा , प्रतिरोध रहेगा. लेकिन मियां एक बार सभ्यता और संस्कृति का हथियार चल गया तो सारी जिरह बंद , सारे तर्क कूड़ेदान में . आप कहेंगे कि उस लड़की के साथ गलत हो गया. जवाब आएगा कि जरुर उसने भारतीय संस्कृति का पालन न किया होगा . 
                                              साल के पहले दिन ही बेंगलुरु के सड़कों पर नए साल का जश्न मानती लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार बड़े स्तर पर होता है. शहर के जगह-जगह पर लड़कियों के साथ अभद्र व्यवहार की जाने की खबर और सीसीटीवी विडियो आते हैं. शर्म की जाने वाली इस घटना पर कर्नाटक राज्य के गृह मंत्री कहते हैं ये घटना लड़कियों के वेस्टर्न कपडे और वेस्टर्न कल्चर के कारण हुए. सरकार पूरा का पूरा मुद्दा कल्चर / संस्कृति को कल्चर के नाम पर लड़कियों को ही दोषी बता रही है. अजीब लगता है पढ़-सुन कर. मतलब किसी भी निंदनीय घटना को कल्चर के नाम पर इग्नोर किया जा सकता है. यह घटना न देश की पहली घटना है है न यह आखिरी होगी. लेकिन आखिर कब तक कल्चर के नाम पर ऐसी घटना होती रहेगी. संस्कृति के नाम पर ऐसी घटनाएँ लड़कियों के साथ ही क्यों होता है ? लड़कों पर सभ्यता संस्कृति से बहक जाने को लेकर ऐसी घटनाएँ क्यों नहीं होती. कुछ साल पहले शाहरुख़ खान की एक फिल्म आई थी स्वदेश’. शाहरुख़ खान अभिनीत पात्र मोहन गाँव की सभा में अमेरिका भारत के सांस्कृतिक टकराहट के संदर्भ में चल रहे बहस में कहता है कि जब भी हम मुकाबले में दबने लगते हैं एक ही चीज़ का आधार लेते हैं संस्कार और परम्परा . अमेरिका ने अपने बूते पर तरक्की की है. उनके अपने संस्कार हैं, अपनी परम्परा है. अब ये कहना कि उनके सोच, विचार, उनका रहना सहन, उनकी मान्यताएं ख़राब है हमारी महान, यह गलत है.’ 

                                    हमारा देश भारत कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या कर रहे किसानों के बावजूद हर वर्ष अरबों रुपये धन हथियार खरीदने में लगा देता है . ये हथियार ख़रीदे जाते हैं फ्रांस , अमेरिका , ब्रिटेन , रूस से पश्चिमी सभ्यता वाला देश. जब भी अपनी सभ्यता को श्रेष्ठ और पश्चिम सभ्यता को पतित बताने वालों को सुनता हूँ तो अनायास से सवाल जेहन में आता है की जब पश्चिम का हथियार बुरा नहीं है तो फिर पश्चिम का सभ्यता कैसे बुरा हो सकता है ? जब आदिवासियों पर अंधाधुंध चल रहे पश्चिम निर्मित ऑटोमैटिक रायफल बुरा नहीं है फिर पश्चिम निर्मित जीन्स सड़क पर पहन कर चल रही लड़की कैसे बुरी हो सकती है ?
                                                   वही कुछ लोग कहते हैं कि ऐसी घटनायों से बचने के लिए लड़कियों को चाकू, स्प्रे जैसी चीज़े ले कर चलना चाहिए. उन्हें मार्शल आर्ट सीखनी चाहिए. ऐसा सुझाव बचकाना भरा है. इससे आप सामने वाले व्यक्ति से भले ही लड़ सकते हैं लेकिन उस विचार से नहीं जो उस व्यक्ति के जैसा हजारों तैयार कर रहा है. आजकल फेमिनिस्म की बात हर कोई कर रहा है , खुद को फेमिनिस्ट साबित करने में हर कोई लगा है . चाहे वो इंटेलेक्चुअल टाइप लोग हैं, एक्टर हैं , स्पोर्ट पर्सन है या चाहे बाज़ार ही . जिस बाज़ार ने लड़कियों को एक वस्तु के तौर पर स्थापित किया, आज वही बाज़ार फेमिनिस्म का सबसे बड़ा रहनुमा बना हुआ है. क्यों की आज फेमिनिस्म भी बिक रहा है. साल भर में कई फ़िल्में फेमिनिस्म पर आ ही जाती है. जो फिल्म वाले महिलायों को बराबरी का मेहनताना नहीं देते हैं वो हल्ला कर के फेमिनिस्म की बात करते हैं इसलिए नहीं की उन्हें वाकई में महिलायों की समस्या से कोई सहानुभूति है बल्कि सारा खेल धंधे का है. देश की टॉप स्पोर्ट पर्सन हैं साइना नेहवाल . बाज़ार हमें यह बताता है की साइना नेहवाल के मेडल जितने से देश की लड़कियों को प्रेरणा मिलेगी और फिर यही बाज़ार साइना नेहवाल से चेहरे को सुन्दर और गोरे बनाने की क्रीम बिकवाता है. साइना नेहवाल को प्रेरणा मान लडकियाँ एक एकदम आगे तो जाएँगी लेकिन फेनिमिस्म में खोह में छिपे नस्लवादी सोच उन्हें भीतर से कमजोर कर देगी.
बंगलौर की घटना हो या कही और की घटना सारा मामला पुरुषवादी सोच और बाज़ार की उपज है. हमने सभ्यता और परंपरा के नाम पर वर्षों सती प्रथा में जिन्दा विधवाओं को जलाया है. जिसपे हमें शर्म होना चाहिए लेकिन आज भी कल्चर के नाम पर ऐसा घटनाएँ का होना आदिम और पशु बनाता है.